लिखना
आज समझ नहीं आता कि क्या लिखूं। ऐसा हर क्षण महसूस करती हूं। ख्याल तो आते रहते हैं। कुछ ख्याल नये होते हैं, कुछ सालों से आते ही जा रहे हैं। जब ख्याल नये नये आते है, तो लगता है कि मैं जी रही हूं। सांस ले रही हूं। मेरा जीना सार्थक हुआ है, कम से कम आज के दिन तो सही। जिस दिन कोई नया ख्याल नहीं आता, उस दिन तो माता रूपी आवाज़ अंदर से आने लगती है, तेरा जीना तो बहुत ही विफल रहा है। मां बचपन में कहती थी कि कुछ तो बड़ा काम करना चाहिए। उसके बड़े काम के क्या मायने है, ये तो पता नहीं। लेकिन उस ' बड़े काम ' की लालसा में जीती रहती हूं। प्रेशर में तो नहीं जीती हूं, लेकिन वो चीज कचोटती तो खूब ही है। एक और चीज़ मां के बारे में लगती है मुझे। मां से मुझे परफेक्शन भी शायद मिला था। वो परफेक्शन को में कहां छोड़ अायी, या पकड़ रखा है, इसका कोई पता जवाब नहीं है। कहते है कि जिनका सन साइन स्कॉर्पियो होता है, वो परफेक्शनिस्ट होते है। मेरे अंदर कहां से आता हैं, ये तो ज़रा भी पता नहीं है, सिर्फ इतना पता है, कि ज़िन्दगी को ज़्यादा फ़ायदा हुआ नहीं उससे। वहीं मोड़ पर है जहां सब है। लेकिन फिर याद आता है क...